
भारतीय सिनेमा के इतिहास में राजेश खन्ना का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा है। वे केवल एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक ‘क्रेज’ थे। 1969 से 1971 के बीच लगातार 15 सोलो हिट फिल्में देने वाले राजेश खन्ना को दुनिया ‘काका’ के नाम से जानती थी। लेकिन इस विशाल सफलता के पीछे एक ऐसा अंधकार भी छिपा था, जिसने बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार को मौत के दरवाजे तक पहुंचा दिया था। एक दौर था जब राजेश खन्ना की सफेद कार लड़कियों के चूमे जाने से गुलाबी हो जाया करती थी। उनके सिग्नेचर स्टाइल और गर्दन झुकाकर मुस्कुराने मात्र से सिनेमाघरों में सिक्के उछलने लगते थे। काका को इस बात का गुमान था कि वे कभी असफल नहीं हो सकते। उन्होंने खुद कहा था, “ऊपर आका और नीचे काका।” लेकिन समय का पहिया घूमा और 1970 के दशक के उत्तरार्ध में अमिताभ बच्चन का उदय हुआ।
जैसे-जैसे एक्शन फिल्मों का दौर शुरू हुआ, राजेश खन्ना की रोमांटिक फिल्मों का जादू कम होने लगा। उनकी एक के बाद एक फिल्में फ्लॉप होने लगीं। जो बंगला ‘आशीर्वाद’ कभी प्रशंसकों की भीड़ से घिरा रहता था, वहां सन्नाटा पसरने लगा। एक बरसात वाली रात, राजेश खन्ना अपने बंगले की छत पर अकेले खड़े थे। शराब और नाकामयाबी के बोझ तले दबे काका इतने टूट चुके थे कि उन्होंने अपनी जिंदगी खत्म करने का फैसला कर लिया। वे छत की मुंडेर पर खड़े थे और नीचे छलांग लगाने ही वाले थे। उन्होंने बाद में स्वीकार किया था,
“मैं उस रात इतना हताश था कि मुझे लगा मौत ही एकमात्र रास्ता है। मुझे अपनी नाकामयाबी बर्दाश्त नहीं हो रही थी।”
कहा जाता है कि उस रात वे आसमान की ओर देखकर जोर-जोर से चिल्लाए थे, “ऐ खुदा! तूने मुझे इतना ऊपर क्यों चढ़ाया, अगर तुझे मुझे इतनी बुरी तरह नीचे गिराना ही था?” यह उस इंसान की चीख थी जिसने कभी खुद को भगवान से कम नहीं समझा था।
राजेश खन्ना की त्रासदी केवल फिल्मी करियर तक सीमित नहीं थी। डिंपल कपाड़िया के साथ उनकी शादी भी खुशहाल नहीं रही। डिंपल उन्हें छोड़कर चली गईं, जिससे उनका अकेलापन और गहरा हो गया। वे अपने कमरे में घंटों अकेले बैठे रहते थे और अपनी ही पुरानी फिल्मों को देखकर रोया करते थे। उनके पास शोहरत थी, पैसा था, लेकिन कोई ऐसा नहीं था जो उनके गिरते हुए मनोबल को थाम सके। काका ने अंततः खुद को संभाला और राजनीति व चरित्र भूमिकाओं के जरिए वापसी की, लेकिन वह ‘सुपरस्टारडम’ दोबारा कभी लौटकर नहीं आया। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि वक्त कभी एक जैसा नहीं रहता। सफलता के शिखर पर इंसान को विनम्र रहना चाहिए, क्योंकि गिरावट उतनी ही दर्दनाक होती है जितनी चढ़ाई ऊंची होती है।
2012 में जब राजेश खन्ना का निधन हुआ, तो पूरा देश रोया। उनके अंतिम सफर में वही भीड़ उमड़ी जो उनके सुपरस्टार रहने के दौरान होती थी। मरते दम तक उनके होंठों पर एक ही बात थी— “पैक अप!”
सुशी सक्सेना
इंदौर मध्यप्रदेश
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